बिहार के इस शहर में बना लिट्टी-चोखा बनाने का वर्ल्‍ड रिकार्ड लेकिन नहीं मिली विश्व में मान्यता – जानिए बिना प्रशासन की मदद से आयोजित मेले की खासियत

डेस्क : बिहार अपने मशहूर लिट्टी चोखा के लिए काफी फेमस है। ऐसे में अब बिहार लिट्टी चोखा को लेकर एक नया रिकॉर्ड बनाने जा रहा है, बता दें कि यह सारा कार्यक्रम बिहार के बक्सर शहर में चल रहा था। रविवार को लिट्टी चोखे को चरित्रवन में खाया गया। इतना ही नहीं कुछ लोगों के लिए तो यह फूड फेस्टिवल की तरह देखा जाता है, बता दें कि यहां पर लोक कथाओं की मान्यता है जिसमें कहा गया है कि भगवान श्रीराम भी इस मेले से जुड़े हुए हैं।

बक्‍सर के पंचकोशी मेले का आज आखिरी दिन। जागरण

यहां पर ध्यान देने वाली बात यह है कि इतना बड़ा आयोजन करने के लिए प्रशासन और सरकार ने किसी भी तरह से स्थानीय लोगों की मदद नहीं की है। जितना हो सके आसपास के लोग ही इस मेले को सुंदर बनाने का प्रयास कर रहे हैं बता दें कि यह सारी गतिविधि 28 नवंबर 2021 को हुई है। इतना ही नहीं बल्कि कई लोग दिल्ली और कोलकाता से चलकर बिहार पहुंचे हैं ताकि वह अपने शहर बक्सर का नजारा देख सकें। फिलहाल के लिए बता दें कि बक्सर में लिट्टी चोखा का मेला काफी पसंद किया जाता है।

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इस मेले को पंचकोशी मेला भी कहा जाता है। लिट्टी चोखा के इस मेले का समापन हो चुका है, ऐसे में लोग गोबर के उपले का इस्तेमाल करके लिट्टी चोखा बनाते हैं और सुबह होते होते शहर के किला मैदान और चरित्रबन के इलाकों में लिट्टी चोखा बनाने का काम शुरू हो जाता है। बता दें कि यह सारा कार्यक्रम पांचवे दिन तक चलाता है।

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5 दिन तक चलने वाले इस मेले में 5 तरह के खाने के आइटम बनाए जाते हैं, बता दें कि इसकी शुरुआत पुआ खाकर होती है। इसके बाद अगले दिन नदांव में खिचड़ी,भभुअर में चूड़ा-दही और नुआंव में सत्तू-मूली खाया जाता है। आखरी दिन जब बचता है तो यहां पर लिट्टी चोखा को बनाकर लोग इसका प्रसाद ग्रहण करते हैं। इतना ही नहीं जब यह मेला लगता है तो कई दुकानदारों को फायदा होता है क्योंकि यहां पर दुकानदार लाख रुपए का कारोबार कर लेते हैं। इतना ही नहीं टमाटर, बैंगन, मूली, हरी, मिर्च, लहसुन, आलू, अदरक और प्याज भी बड़े स्तर पर बिक जाता है।

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बक्सर के लोकप्रिय अधिवक्ता और समाजसेवी रामेश्वर प्रसाद वर्मा ने बताया कि यह मेला हम भगवान श्री राम की याद में बनाते हैं। ऐसे में हम अपने देवी-देवताओं को याद करते हुए इस मेले के जरिए सामाजिक सौहार्दता लाते हैं। इतना ही नहीं कई स्थानीय सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि इस मेले को विश्व स्तर पर पहचान दी जाए। दूसरी तरफ सामाजिक कार्यकर्ता जितेंद्र मिश्र का कहना है कि इस मेले को विश्व रिकॉर्ड की सूची में दर्ज करना चाहिए।

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