लड़की ने बना दी पूरी तरह ईकोफ्रेंडली बोतल, बड़ी-बड़ी कंपनियों में मची खरीदने की होड़.. जानिए क्या है खास

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डेस्क : कागज के कई टुकड़ों को चिपका कर तैयार की गई बोतल ओर प्राकृतिक गोंद से चिपका दिया जाता है। यह बोतल कागज और मिट्टी में घुले प्राकृतिक तत्व से बना होता है। बोतल का इस्तेमाल भी नौ महीने तक किया जा सकता है। प्लास्टिक की बोतलें यूज होना आम हैं।

इन बोतलों से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को अब कम किया जा सकता है। यह सब कागज से बनी बोतल से संभव होगा। वर्तमान में इसका उपयोग शैंपू, कंडीशनर और हैंडवाश पैक करने के लिए ही किया जा रहा है। पानी या अन्य तरल पदार्थों से भरे जाने पर यह कागज़ की बोतल ख़राब नहीं होती है और बाद में आसानी से डिस्पोज हो जाती है। यह इनोवेशन समीक्षा गनेरीवाल ने किया है जो पानी और जूस के लिए ही ऐसी बोतलें तैयार कर रही हैं।

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उन्होंने पेटेंट के लिए आवेदन भी किया है। तीन खाद्य और पेय कंपनियों ने भी उनके साथ गठजोड़ करने की इच्छा व्यक्त की है। नोएडा के सेक्टर 15ए की रहने वाली समीक्षा हैदराबाद में एमबीए की पढ़ाई करने के बाद नौकरी के दौरान एक प्रोजेक्ट में प्लास्टिक के विकल्प पर काम कर रही थी। प्रोजेक्ट के दौरान उन्हें आइडिया आया कि प्लास्टिक से पहले भी लोग किसी न किसी चीज में खाने-पीने का सामान रखते थे। बारिश में पानी की बूंदें पत्तियों और घास पर रह जाती हैं।

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यानी इनमें एक ऐसा तत्व होता है जो पानी को रोकने वाला होता है। सोचा क्यों न ऐसा प्रोडक्ट बनाया जाए जिसमें पानी और जूस रखा जा सके। फिर कागज की बोतलें बनाने का फैसला किया। साल 2016 में वह नोएडा चली गईं और कागज की बोतलें बनाने में जुट गईं। कंपनी 2018 में स्थापित हुई थी और दो साल तक विभिन्न शोध करने के बाद प्रोटोटाइप बनाने में भी सफल रही। शुरुआत में पानी रखने के लिए एक बोतल बनाई जाती थी। एक रिश्तेदार से संपर्क किया, जिसकी फैक्ट्री में शैंपू और कंडीशनर वाली बोतलें बनाई जाती थीं। कारखाने में अत्याधुनिक मशीनों के होने से रिसर्च में मदद काफ़ी मिली।

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इस दौरान पता चला कि दो यूरोपीय कंपनियां पल्पेक्स और पाब्को, कोका-कोला और लारेल के लिए कागज की बोतलें बनाती हैं। हालांकि इन बोतलों के अंदर प्लास्टिक की एक पतली परत भी होती है, जिसकी वजह से ये 85 फीसदी ही इको फ्रेंडली होती हैं। शोध में सामने आया है कि फिलहाल बोतल सिर्फ शैंपू और कंडीशनर रखने के काम आती है। समीक्षा पर शोध करने के बाद यह निष्कर्ष निकला कि कागज के गूदे में स्टार्च मिलाकर इसे उपयोगी बनाया जा सकता है, जिससे बोतल पिघलेगी नहीं। इस पर काम किया और बोतल तैयार है। यह अपनी तरह की पहली बोतल है जो 100% पर्यावरण के अनुकूल है। फिलहाल 330 एमएल क्षमता की बोतल बनाई गई है।

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स्क्रैप पेपर का उपयोग : कागज के उपयोग पर समीक्षा से पता चलता है कि इसमें कोई विशेष कागज नहीं है, लेकिन बेकार अखबार, कॉपी-किताबें, कार्डबोर्ड का उपयोग किया जा सकता है। हिमाचल प्रदेश के बद्दी में स्थित एक फैक्ट्री से ठेका लेकर वहां बोतलों का उत्पादन किया जाता है। जल्द ही यह यूनिट नोएडा में भी स्थापित की जाएगी।

नौ महीने बाद इसे मिट्टी में गाड़ दें। : तीन महीने में नष्ट होने के बाद इसे घर में रखे गमलों और पलंगों की मिट्टी में गाड़ दिया जा सकता है। 19 रुपये की लागत से एक प्लास्टिक की बोतल तैयार की जा रही है। फिर भी इसकी कीमत कम करने पर अभी ओर काम चल रहा है।