इंटरनेशनल वुमन डे : पद्मा पुरस्कारों में बिहार की महिलाओं ने मारी बाज़ी, अब तक 15 महिलाओं को मिल चुका है अवार्ड

डेस्क : भारत को 1947 में आजादी मिल गई थी। सन 1947 से पहले भारत में बड़ी मुश्किल से एकता की भावना पैदा की गई, जिसके बाद अब हमें कठिन परिस्थितियों में आजादी मिली है। लेकिन आजादी के कुछ साल बाद पद्म पुरस्कार की घोषणा की गई बता दें की पद्म पुरस्कार की घोषणा सरकार द्वारा 1954 में की गई और 1954 के बाद से अनेकों लोगों को अब तक पद्म पुरस्कार मिल चुका है। भारत की कई महिलाएं जो पद्म पुरस्कार ले चुकी हैं।

ऐसे में आज इंटरनेशनल वूमेंस डे है और इस डे पर भारत के सबसे प्रचलित राज्य बिहार में महिलाओं ने जमकर पद्म पुरस्कार बटोरे हैं। आज हम उन्हीं महिलाओं के बारे में बात करने वाले हैं जिन्होंने पद्म पुरस्कार हासिल किया है। बता, दें कि पद्म पुरस्कार उनको मिलता है जो लोग सामाजिक छवि को उठाने का काम करते हैं। बिहार की महिलाओं ने अनेकों क्षेत्र जैसे लोक संगीत, लोक कला, चिकित्सा, साहित्य, खेती-किसानी और समाज सेवा में काम करके हासिल किया है।

यहाँ पर सोचने वाली बात यह है की 15 महिलाओं में से 7 महिला जो पुरस्कार पा चुकी हैं वह एक ही क्षेत्र से हैं। ज्यादातर महिला मिथिला की चित्रकला के लिए सम्मानित की जा चुके हैं और उन सबके नाम इस प्रकार हैं शुमार स्व. जगदम्बा देवी, स्व. गंगा देवी,स्व. महासुंदरी देवी, बउआ देवी, गोदावरी दत्ता, स्व. सीता देवी और दुलारी देवी जो इस साल चयनित हुईं हैं, यह सारी महिलाएं एक ही जिले की हैं।

सबसे पहले बिहार की महिला को 1974 में सम्मानित दिया गया, उनका नाम कोकिला विंध्यवासिनी देवी है। उनको लोक गायन के लिए चुना गया था, उसके बाद 1975 में मधुबनी की रहने वाली जगदंबा देवी को पुरस्कार दिया गया था। फिर 1981 में गंगा देवी और 1984 में गंगा देवी को पद्मश्री से भी नवाजा गया। समाज का सुधार करने के लिए सुधा वर्गीज को 2006 में पुरस्कार दिया गया। उसके बाद साहित्य के क्षेत्र में काम करने हेतु एवं हिंदी लेखन को आगे बढ़ाने के लिए डॉक्टर शांति जैन को पद्म सम्मान मिला है। हाल ही में दो चर्चित महिलाओं को पद्मश्री दिया गया है। एक महिला को मरणोपरांत यह सम्मान मिला है और दूसरी महिला को मिथिला की चित्रकला के लिए सम्मान मिला है।

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