क्या आप जानते हैं जलियांवाला बाग हत्याकांड की तरह मुंगेर में भी हुआ था नरसंहार, छलनी हुए थे 34 सपूतों के सीने..

डेस्क : भारत की आज़ादी में कई संघर्षो के किस्से कहे और सुने गए होंगे क्योंकि बर्तानिया शासन के खिलाफ विद्रोही घटनाओं का इतिहास काफी लंबा रहा हैं, जैसे जैसे समय आगे बढ़ता गया धीरे धीरे उन तमाम संघर्षों को भुला दिया गया।

स्वतंत्रता के संग्राम का दूसरा सबसे बड़ा बलिदान : अगर स्वतंत्रता सेनानियों की बात करें तो हम इतिहास की पुस्तकों में, फिल्मों में, गानों में और सरकारी माध्यमों में चर्चित नामों को ही सिर्फ जानते हैं. लेकिन, सैकड़ों क्रांतिवीरों के बलिदान के बारे में हम नहीं जानते हैं. जो आज आजादी के 75 साल बाद भी एक गुमनामी के अंधेरे में खोए हुए हैं. उन्हें या तो भुला दिया गया है या फिर उन्हें हाशिये पर डाल दिया हैं. ऐसा ही एक वाकया तारापुर से जुड़ा हुआ है.

कई स्वतंत्रा सेनानियों के नाम तक नहीं मालूम : कई स्वतंत्रा सेनानियों का तो कुछ अता पता भी नहीं हैं, क्योंकि उनके बारे में कभी कुछ जानने और बताने की कोशिश ही नहीं की गई हैं. आप और हम सभी जलियांवाला बाग की घटना को अच्छे से जानते हैं, लेकिन शायद किसी को पता हो भी या न हो कि आजादी के इस समर में बिहार के तारापुर का गोलीकांड कितनी महत्वपूर्ण घटना थी. इस घटना की जितनी चर्चा होनी चाहिए थी, शायद उतनी कभी हो नहीं पाई.

भीषण नरसंहार के लिए जाना जाता है तारापुर : बिहार का तारापुर जो उस समय मुंगेर जिला का हिस्सा छोटा सा बाजार हुआ करता था, वह भी इससे अछूता नहीं रहा. यह कस्बानुमा शहर तारापुर 15 फरवरी सन 1932 को बर्तानिया हुकूमत द्वारा हुए भीषण नरसंहार के लिए जाना जाता है. आजादी के दीवाने 34 वीरों ने तारापुर थाना भवन पर तिरंगा फहाराने के संकल्प को पूरा करने के लिए अपने सीने पर गोलियां खायी थीं और वीरगति को प्राप्त हुए थे. जिनमें से सिर्फ 13 शवों की ही पहचान हो पाई थी. सन 1931 के गांधी इर्विन समझौते को रद्द किए जाने के विरोध में कांग्रेस सरकारी भवन से ब्रिटिश यूनियन जैक उतारकर तिरंगा फहराने के लिए पहल की गई थी.

कैलाश राजहंस ने बनाई थी तिरंगा झंडा फहराने की योजना : घटना के साक्षी एवं योजना के भागीदार रहे स्वतंत्रता सेनानी श्री कैलाश राजहंस के अनुसार सुपर जमुआ के श्री भवन में तारापुर थाना भवन पर तिरंगा झंडा फहराने की योजना बनाई थी. 15 फरवरी सन 1932 को आस-पास के गांव के हजारों युवाओं ने मिलकर तिरंगा फहराने के संकल्प के साथ तारापुर थाना भवन पर धावा बोल दिया जोशीले युवा भारत माता की जय और वंदे मातरम का जय घोष लगातार कर रहे थे. उस वक्त के कलेक्टर EO Lee व SP W फ्लेग ने स्वतंत्रता सेनानियों पर अंधाधुंध फॉयरिंग करवा दी।

21 शहीदों की नहीं हो पाई थी पहचान : इतिहासकारों के अनुसार इस गोली काण्ड में पुलिस बल द्वारा कुल 75 राउंड गोलियां चली जिसमें 50 से भी ज्यादा क्रान्तिकारी शहीद हुए एवं सैंकडों क्रान्तिकारी घायल भी हुए. गोलीकांड के तीन दिन बाद सिर्फ 13 शहीदों की ही पहचान हो पाई थी. जिनकी पहचान हो पाई थी वो थे शहीद विश्वनाथ सिंह (छत्रहार), शहीद महिपाल सिंह (रामचुआ), शहीद शीतल (असरगंज), शहीद सुकुल सोनार (तारापुर), शहीद संता पासी (तारापुर), शहीद झोंटी झा (सतखरिया), शहीद सिंहेश्वर राजहंस (बिहमा), शहीद बदरी मंडल (धनपुरा), शहीद वसंत धानुक (लौढि़या), शहीद रामेश्वर मंडल (पड़भाड़ा), शहीद गैबी सिंह (महेशपुर),शहीद अशर्फी मंडल (कष्टीकरी) तथा शहीद चंडी महतो (चोरगांव). वहीं इसके अलावे 21 शव ऐसे मिले जिनकी पहचान नहीं हो पायी थी और कुछ शव तो गंगा में भी बहा दिए गए थे.

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